एग्रीकल्चर और नॉन एग्रीकल्चर उत्पाद

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एग्रीकल्चर प्रॉडक्ट

मुख्य तौर पर कृषि उत्पादों को इस कैटेगरी में लिस्ट किया गया है। गेंहू, चावल, दाल, सोयाबीन जैसे जिंस और उनके उपोत्पाद (सब साइडरी प्रॉडक्ट्स) पर इनकी ट्रेडिंग होती है। लेकिन इनका कार्यक्षेत्र स्थानीय मंडी तक ही सीमित है। राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर इस श्रेणी के उत्पादों की ट्रेडिंग के चलन ने अभी जोर नहीं पकड़ा है।

नॉन एग्रीकल्चर प्रॉडक्ट

कृषि उत्पादों के अलावा ऐसे उत्पाद जो खनन (माइनिंग एंड ड्रिलिंग) आधारित होते हैं को नॉन एग्रीकल्चर उत्पादों की श्रेणी में रखा गया है। इनके उत्पादों की ट्रेडिंग पर कंपनी 100McxTipsका मुख्य फोकस है। नॉन एग्रीकल्चर उत्पादों को शेयर मार्केट में तीन कैटेगरी में दर्ज किया गया है। जो बेस मेटल बुलियन और एनर्जी सेक्टर के नाम से चलन में हैं।
बेस मेटल-

  1. एल्युमिनियम
  2. कॉपर
  3. लेड
  4. निकल
  5. जिंक

बुलियन (सराफा) –

  1. सोना
  2. चांदी

एनर्जी-

  1. क्रूड ऑयल
  2. प्राकृतिक (नैचुरल) गैस

 

स्टॉक और स्टॉक मार्केट

  • स्टॉक और स्टॉक मार्केट क्या है?
  • कैपिटल क्या होती है?
  • आईपीओ और डीमेट एकाउंट क्या है?
  • सेबी की गाइडलाइन क्या होती है?

इसे कुछ इस तरह से समझा जा सकता है-

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कैपिटल-

जब कोई कंपनी अपना कोई प्रोजेक्ट लाभ कमाने के मकसद से शुरू करती है। तो इस प्रोजेक्ट को शुरू करते हुए प्रक्रिया जारी रखने में लगने वाली कुल लागत को कैपिटल कहा जाता है। जिसमें नकद से लेकर कंपनी की संपत्तियों और मशीनरी को शामिल किया जाता है। फिजिकल एसेट के बाजार मूल्य के आधार पर ही संपत्ति का वैल्यूशन किया जाता है। कोई कंपनी अपने निजी धन के आधार पर भी शुरू की जा सकती है। और यदि निजी धन की कमी है तो साझेदारों बैंक लोन के जरिए भी धन जुटाया जा सकता है। लेकिन जब लागत बहुत ज्यादा हो तो कंपनी शेयर्स के जरिए भी धन जुटा सकती है। इसके लिए सेबी ने कुछ गाईड लाइन बनाई हैं। जिसका पालन शेयर जारी करने वाली कंपनी को करना होता है।

शेयर और आईपीओ-

जब कंपनी शेयर्स के जरिए धन जुटाती है। तो उसे आईपीओ (इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग) जारी करना पड़ता है। इसके लिए कंपनी निर्धारित धन जुटाने के लिए कुल शेयर्स की संख्या के साथ ही प्रत्येक शेयर का दाम तय करती है। और सार्वजनिक तौर पर उन शेयर्स को बाजार में बेचने के लिए पेश करती हैं। आईपीओ जारी करने के दो से तीन महीने के अंदर कंपनी को किसी राष्ट्रीयकृत ट्रेडिंग एक्सचेंज में रजिस्टर्ड होना जरूरी है।

सेबी-

सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) (SEBI) कंपनी और अशंधारकों (शेयर होल्डर्स) के हितों की रक्षा करता है। इसके साथ ही सेबी अंशधारकों के लिए समय समय पर बाजार में लिस्टेड कंपनियों से जुड़ी एडवाइजरी भी जारी करती है। ताकि निवेशक किसी भ्रम में न पड़ें।

ट्रेडिंग एक्सचेंज

कंपनियों से जुड़े शेयर्स और शेयर होल्डर्स के बीच विनिमय (एक्सचेंज) के लिए ट्रेडिंग एक्सचेंज की व्यवस्था की गई है। यहां जुड़ने वाली कंपनियों को एक्सचेंज के तय मानकों का पालन करना होता है। ताकि निवेशकों को एक्सचेंज करने में आसानी हो सके। भारत में मुख्य तौर पर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के जरिए कंपनियों का कारोबार होता है। इसके अलावा रीजनल एक्सचेंज से भी विनिमय होता है लेकिन ये चलन में नहीं है। कोई भी कंपनी एनएसई या फिर बीएसई में खुद को लिस्ट करा सकती है। 100McxTips मुख्य तौर पर एनएसई से जुड़े निवेशकों को लाभ कमाने के अवसर की जानकारी देती है। क्योंकि इस एक्सचेंज में मुख्य रूप से बड़ी कंपनियां लिस्टेड हैं। एमसीएक्स में निवेशकों को इंट्रा डे ट्रेडिंग पर जोर दिया जाता है। जिसमें दैनिक निवेश के सबसे बढ़िया विकल्प निवेशक को सुझाए जाते हैं। यहां ये समझना जरूरी है कमोडिटी और स्टॉक एक्सचेंज अलग-अलग होते हैं। और इनके काम करने का तरीका भी लगभग अलग है।

एमसीएक्स

निवेशकों को बेहतर प्लेटफॉर्म देने के उद्देश्य से गुजरात के जिग्नेश शाह ने साल  में एमसीएक्स की शुरुआत की थी। इस एक्सचेंज का आइडिया यूएस और यूके आधारित है। एमसीएक्स में निवेशकों को पांच से दस पर्सेंट की मार्जिन मनी पर लाभ कमाने के मौके मिलते हैं। और निवेशकों को पूरी राशि जमा न करने की छूट भी खास तौर पर एक्सचेंज ने दी है। एमसीएक्स में रजिस्टर्ड निवेशकों का कंपनी में एक ट्रेडिंग एकाउंट खोला जाता है। जिसमें इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में राशि जमा होती है। और इसके मार्फत निवेशक वर्चुअल एक्सचेंज के जरिए तगड़ा मुनाफा कमा सकते हैं। यहां यह जानना जरूरी है एमसीएक्स में फिजिकल लेनदेन नहीं होता है। एमसीएक्स निवेशकों को खरीदार (बायर) और विक्रेता (सेलर) की जानकारी देता है ताकि उचित समय पर निवेशक कमोडिटी को खरीदने और बेचने का निर्णय ले सके।

ट्रेडिंग एकाउंट

ट्रेडिंग एक्सचेंज में लेनदेन करने के लिए सबसे पहले राष्ट्रीयकृत एक्सचेंज में ट्रेडिंग अकाउंट खोलना जरूरी है। इसके जरिए निवेशक कंपनियों के शेयर्स और कमोडिटी को खरीद और बेच सकते हैं। राष्ट्रीयकृत एक्सचेंज स्टॉक एक्सचेंज और कंपनियों के लिए एक सेतु (पुल) का काम करती है। ट्रेडिंग अकाउंट के जरिए निवेशक अपने धन को लंबे समय तक के लिए इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में रख सकता है। और जरूरत पड़ने पर निवेश करने का निर्णय ले सकता है। ट्रेडिंग अकाउंट की राशि से शेयर्स खरीदे जाते हैं तो उन्हें डीमेट अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

डीमेट एकाउंट

ये खाता स्टॉक मार्केट में लेनदेन के लिए उपयोग में लाया जाता है। जो अथऑरिटी डीमेट अकाउंट ओपन करती है उसे डिपॉसिटरी पार्टिसिपेंट कहा जाता है।

ट्रेडिंग एक्सचेंज की चेन

मुंबई आधारित ट्रेडिंग एक्सचेंज (जैसे NSE, BSE, MCX, NCDEX) ने देश के निवेशकों को सेवाएं देने के लिए ब्रोकर्स की नियुक्ति की है। ये ब्रोकर निवेशकों के लिए खरीद-फरोख्त करने के लिए काम करती है। ट्रेडिंग एक्सचेंज का ब्रोकर बनने के लिए कंपनी बड़ी राशि चार्ज करती है। जो करोड़ों में होती है। मेन मैंबर बनने के लिए एक्सचेंज कैंडिडेट से सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा कराती है। ताकि निवेशकों के हितों की रक्षा की जा सके। ट्रेडिंग एक्सचेंज में मेन मैंबर्स या ब्रोकर्स (शेयरखान एंजल ब्रोकिंग इंडिया इन्फोलाइन एसएमसी आदि) के नीचे सब ब्रोकर्स भी नियुक्त किये गये हैं। जो छोटे शहरों के निवेशकों तक अपनी पहुंच बनाकर निवेश के मौके मुहैया करा रहे हैं। इस सेवा के बदले ब्रोकर्स निवेशकों से ब्रोकरेज चार्ज करते हैं। अगर क्लाइंट को ट्रेडिंग एक्सचेंज से जुड़ना है तो वो मेन ब्रोकर्स या फिर सब ब्रोकर्स से जरिये जुड़ सकता है। ट्रेडिंग एक्सचेंज की सेवाओं का लाभ पाने के लिए कैंडिडेट (निवेशक) को रजिस्ट्रेशन मनी ब्रोकरेज स्टॉक ट्रांजेक्शन टैक्स (एसटीटी) चुकाना होता है। जिससे जहां निवेशक को उचित परामर्श के साथ एक्सचेंज प्रोसेस में मदद मिलती है। वहीं मेन और सब ब्रोकर्स को भी आमदनी का जरिया मिल पाता है। ट्रेडिंग एक्सचेंज से जुड़ने के बाद निवेशक स्वयं ऑन लाइन तरीके से या फिर चैनल के जरिए ट्रांजेक्शन कर सकता है। इसके लिए मोबाईल पर एप का इस्तेमाल कर ट्रांजेक्शन किया जा सकता है। या फिर फोन इन के मार्फत एजेंट को निवेश करने की भी इजाजत दी जा सकती है।

कमोडिटी एक्सचेंज

  • MCX (मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज)- एग्रीकल्चर और नॉन एग्रीकल्चर बेस्ड ट्रेडिंग प्लटफार्म है। लेकिन इसका जोर नॉन एग्रीकल्चर स्ट्रीम में ज्यादा है।
  • NCDEX (नेशनल कमोडिटी डेरिवेटिव एक्सचेंज)- ये भी एक एग्रीकल्चर और नॉन एग्रीकल्चर बेस्ड ट्रेडिंग प्लटफार्म है। लेकिन इसका जोर एग्रीकल्चर स्ट्रीम में ज्यादा है।

 

स्टॉक एक्सचेंज-

  • NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज)- इस एक्सचेंज में खास तौर पर बड़ी कंपनियां लिस्टेड हैं।
  • BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज)- एनएसई से पहले शुरू होने वाले बीएसई में मुख्यतः छोटी-बड़ी दोनों कंपनियां लिस्टेड हैं।

 

लाभ का फंडा:

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लाभ का एक आसान फार्मूला यदि समझा जाए तो शेयर्स को खरीदने का मूल्य उसको बेचने के मूल्य से कम होना चाहिए। यानि विक्रय मूल्य क्रय मूल्य से अधिक होने पर निकलने वाला अंतर ही कुल लाभ कहलाता है। सेलिंग प्राइज हमेशा बाईंग प्राइज से अधिक होना चाहिए। नहीं तो निवेशक को लाभ नहीं मिल पाएगा।

ट्रेड

  • कोई भी निवेशक दो तरह से ट्रेडिंग कर सकता है। एक है होल्डिंग ट्रेड जिसकी अवधि शॉर्ट मीडियम या लॉन्ग टर्म की हो सकती है। और दूसरा है इंट्रा डे ट्रेड जिसमें ट्रेड को सेम डे पर स्क्वेयर ऑफ किया जाता है।
  • होल्डिंग ट्रेड के जरिए निवेशक लंबी अवधि का निवेश कर लाभ कमाने के लिए तय समय तक का इंतजार करता है। और होल्डिंग ट्रेड में बाय कॉल के मार्फत निवेश किया जाता है। लंबी अवधि के निवेश में मार्केट में उछाल आने पर बाय कॉल से फायदा मिलता है। मतलब इसमें निवेशक को संबंधित कंपनियों के शेयर्स या कमोडिटी को खरीदना होता है और रेट बढ़ने पर शेयर या कमोडिटी को बेचना होता है।
  • जबकि इंट्रा डे टर्म में बाजार के ऊपर जाने से पहले शेयर और कमोडिटी को खरीदा जाता है और दाम बढ़ने पर उसे बेच दिया जाता है। इस तरह से बाय कॉल के जरिए शेयर्स और कमोडिटी को खरीदकर लाभ कमाया जाता है। जबकि बाजार के नीचे जाने से पहले शेयर और कमोडिटी को बेच दिया जाता है और दाम के नीचे आने पर उसे खरीद लिया जाता है। इस तरह से सेल कॉल के जरिए शेयर्स और कमोडिटी को बेचकर प्रॉफिट कमाया जाता है।